सब्र करो सब्र करने वालों के साथ अल्लाह है, पढ़ें ईसाई धर्म से इस्लाम में आई एक औरत की दास्तान

मेरा नाम विक्की नासेर है। मेरी माँ एक हाउसवाइफ है और मेरे पिता एक इंजीनियर है। मेरे बड़े भाई भी हैं जो की बहुत ही ज़्यादा नैतिक थे। वह अपने हर काम को एक तरीके से करते थे। मैं बहुत ही ज़्यादा शर्मीली और अच्छे व्यवहार वाली लड़की थी।

मैं जब छोटी थी तो मैं अपने भाई के साथ स्कूल जाती थी और हम रविवार को वही स्कूल जाते थे क्योंकि हमारे स्कूल में रविवार को बाइबिल पढाई जाती थी। फिर उसके बाद हम दोनों ने अपनी संडे की क्लास छोड़ दी क्योंकि हमारे माता पिता को काम की वजह से बाहर जाना पड़ा उसके बाद फिर हम कभी भी जल्दी चर्च नही जा पाए और जैसे की हमारा चर्च से नाता ही टूट गया हो। जब मैं 10 साल की हो गई, मैं एंगलां में थी, तब मेरी एक दोस्त थी उसने कहा की एक पास में चर्च है तो हम जा सकते है। और फिर हम चर्च से जुड़ गई और वहां जाने लगे।

मैं अपने घर में अकेली थी जो की ईसाइयत और बाइबिल के साथ चल रही थी। मैं ईश्वर पर विश्वास रखती थी, मैं किताबों पर भी विश्वास करती थी। पर मेरे दिमाग में एक दुविधा रहती थी की मैं ईश्वर की प्रार्थना करूँ या ईसा की। यहीं से मुझे ईसाई धर्म को लेकर कुछ सवाल होने लगे। मैं बिलकुल ही ईश्वर को मानती थी जैसा की मैंने बताया की मैं ईसाई थी। जैसे जैसे मैं बड़ी होती गई मेरा ईसाइयत से भरोसा उतरने लगा। मैं डॉक्टर बनना चाहती थी। मैं बहुत पढ़ती थी पर फिर भी मेरे नम्बर अच्छे नही आए इस बात से मुझे बहुत बुरा लगा और फिर मैं गलत रास्ते पर आ गई और मैं शराब भी पीने लगी। मेरा ईसाइयत से बिलकुल भरोसा उठ गया था तो मैं नास्तिक हो गई थी। मैंने किसी और धर्म के बारे में नही सोचा था। मैं बस अपनी ज़िन्दगी में आगे बढ़ना चाहती थी। मैं फिर अपनी ज़िन्दगी में बीएस मौज मस्ती कर रही थी पर मेरे दिल में एक तरह का बोझ था। मुझे ऐसा लगता था की मैं जान बूझ क्र अपने आप को खुश रखने की कोशिश कर रही थी।

जब मैंने कॉलेज जाना शुरू किया उससे पहले मेरे कोई भी मुसलमान दोस्त नही थे। मैं अपने कॉलेज में देखती थी की कई महिलाऐं हिजाब पहने रहती थी पर वह मेरे लिए अनजान थी और मैं उन पर ज़्यादा ध्यान नही देती थी। मै समझती थी की सभी मुसलमान आतंकवादी होते हैं और वह अच्छे नही होते तो इसीलिए मैं कभी उन पर ध्यान भी नही देती थी। पर कॉलेज में मेरी एक मुसलमान दोस्त बन गई जो की सूडान से थी। मैंने अपनी ज़िन्दगी में आगर सबसे अच्छा इंसान देखा है तो वो वही थी। मैं उसके घर रहने के लिए गई थी तो उसकी माँ ने मेरे साथ ऐसा व्यवहार किया की जैसे मैं उनकी दूसरी बेटी हूँ। और उसकी बहन ने भी मेरा बहुत अच्छे से स्वागत किया और यही पहली तस्वीर मेरे दिल में इस्लाम को लेकर बनी। और इसका मेरे ऊपर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ा। मैं उनके साथ बहुत सुकून महसूस कर रही थी।

जब मैं यूनिवर्सिटी पहुची तो मेरे और भी मुसलमान दोस्त बने जो की सऊदी से थे, और उन्होंने देखा की मैं ईसाई धर्म से हूँ और मैं बाइबिल पर चलने वाली हूँ। तो वह मुझसे अपने और मेरे धर्म की समानताओं के बारे में बात करते थे जिससे की मैंने बहुत सी नई बातें सीखीं। उन्होंने कभी भी मुझे इस्लाम को लेकर कभी भी कोई बात थोप नहीं है। वह बस अपने धर्म की बातें बताया करते थे। जोकि मुझे बाहत अच्छी लगती थी। मैंने बहुत सी ऐसे बातें जानी जिनको मैं पहले गलत समझती थी मैं सोचती थी की इस्लाम में बहुत सी बुराइयां हैं पर मैंने देखा की इस्लाम को इस्लाम को जैसा दिखाया जाता है वैसा इस्लाम है नही। उन लोगो की बातों को सुन क्र मैंने जाना की इस्लाम में हर बात का तर्क है। मैंने विडियो और किताबें भी पढ़नी शुरू कर दी। फिर मेरे एक दोस्त ने मुझे क़ुरआन दिया और मुझे उसको पढ़ने को बोला। मैं क़ुरआन को पढ़ क्र बहुत हैरान थी। जो भी मेरे दिल दिमाग में इस्लाम को लेकर सोच थी की इस्लाम आत्मनकवाद को बढ़ावा देता है सब मेरे दिमाग से साफ़ हो गई। यह मेरे दिल में एक बहुत बड़ा बदलाव आ रहा था।

जब मैंने इस्लाम को सीखना शुरू किया तो मैंने जाना की इस्लाम में हर चीज़ का तर्क है और हर सवालों के जवाब हैं। मैंने एक बात जानी की जो भी हम सोचते हैं वो कभी नही होता पर जो अल्लाह चाहता है वो ही होता है, और अल्लाह हमेशा अच्छा ही चाहता है। मैंने एक दस्तावेज़ पढ़ा था उसमे लिखा था की एक औरत जो की अकेले खुद ही मुसलमान हुई थी। उसमे उसने लिखा था की उसके जीवन में कई तरह की परेशानियां थी। जैसे की उसको शराब पीने की आदत थी और वह बहुत से गलत लोग की संगत में थी। उसका एक लड़का दोस्त था उससे उसने शादी कर ली। वह लड़का बहुत अच्छा और इस्लामिक था और उसने उस लड़की की भी ज़िन्दगी सुधार दी। इस दस्तावेज़ से मैं बहुत प्रेरित हुई। और फिर मैंने सोच लिया की मैं मुसलमान हो जाउंगी।

तो मैंने अपने कई दोस्तों और जो मेरे आस पास के लोग थे, मैं उनके पास गई और कहा की मैं मुसलमान बनना चाहती हूँ तो मेरा जो सऊदी दोस्त था वह बहुत हैरान हो गया और उसने कहा की सच, तुम ऐसा चाहती हो मैंने कहा की हाँ। तो उसने मेरी बहुत मदद की उसने मुझसे बताया की मैं इस्लाम में आने के बाद शराब नही पी पाऊँगी, मुझे पांच वक़्त नमाज़ पढ़नी पड़ेगी और हिजाब भी पहनना पड़ेगा। क्या तुम इतना कर पाओगी। मुझे एक और बात का बहुत डर था की क्या मुसलमान मुझे स्वीकार करेंगे या नही कहीं ऐसा न हो की मैं मस्जिद जाऊं और वह से मुझको वापस भेज दिया जाए।

मेरे मुसलमान होने के बाद शुरुआत में मैंने हिजाब नही पहना था तो कई लोग समझ नही पाते थे की मैं मुसलमान हो गई हूँ। कभी कभी वह मुझसे पूछ लेते की क्या तुम शराब पीने चलोगी तो मैं मना कर देती और कहती की अगर कॉफ़ी पीना है तो बताओ। धीरे धीरे सब मुझसे दूर होने लगे क्योंकि अब मैं शराब नही पीती थी।
हाँ मैं मानती हूँ की शुरुआत में मैं थोड़ा अकेला महसूस करने लगी थी पर मेरे ऊपर अल्लाह की रहमत थी और धीरे धीरे सब कुछ ठीक हो गया। और फिर मैंने हिजाब भी पहनना शुरू कर दिया। हिजाब पहनने पर मैंने देखा की जब मुसलमान हुई तो एक तरफ लोग मेरी इज़्ज़त करते और दूसरी तरफ जब मैं कभी रास्ते पर चलती तो लोग मेरे साथ उत्पीडन करते थे और मुझे बहुत नीची नज़र से देखते थे। मैं मानती हूँ की यह बहुत ज़्यादा असुविधाजनक था पर मैं इस्लाम पर डटी रही।

मैंने बहुत सी परेशानियां सही हैं पर अगर किसी का इरादा मजबूत हो और अपने अल्लाह पर भरोसा हो तो वह हर बुराई पर सब्र कर सकता है। क़ुरआन भी कहता है की “सब्र करो, सब्र करने वालों के साथ अल्लाह है”। क़ुरआन पूरी इंसानियत के लिए है, जिन्होंने क़ुरआन को कभी नही पढ़ा है मैं उनसे कहना चाहूंगी की वह एक बार क़ुरआन को ज़रूर पढ़ें। और इसको मुसलमान होने के लिए नही सिर्फ इस्लाम को समझने के लिए पढ़ें।

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