यह चौदह अधिकार जुड़े हैं महिलाओ से, सभी को होने चाहये मालूम

ये वो चौदह अधिकार हैं, जो हर महिला को पता होना चाहये. आप भी जानये…

1.Right to virtual Complaints
महिलाएं किसी कारणवश पुलिस स्टेशन जाकर एफआईआर दर्ज नहीं करा सकती हैं तो वो अपनी शिकायत ईमेल या पत्र द्वारा पुलिस को दे सकती हैं। फिर पुलिसकर्मी उस कम्प्लेंट को पुलिस स्टेशन के सीनियर हाउस ऑफिसर (SHO) को भेज देते हैं। इसके बाद संबंधित पुलिस स्टेशन में कम्प्लेंट पहुंचने के बाद पुलिस खुद उस महिला के घर या घटनास्थल पर जाकर इन्वेस्टिगेशन करती है।

2.Right to Confidentiality
महिलाएं अपने किसी भी मामले की गोपनीयता का पूरा अधिकार रखती हैं। मीडिया पीड़ित महिला की पहचान सार्वजनिक नहीं कर सकता। महिलाएं जिला मजिस्ट्रेट के सामने अकेले में अपना बयान दे सकती हैं। कोर्ट में सुनवाई के समय वकील भी महिलाओं को पीड़िता संबोधित करते हैं।

3.Right to Free Legal help
सेक्शुअल हैरेसमेंट या रेप पीड़ित महिला को Legal Services Authority Act 1987 के तहत फ्री में कानूनी मदद लेने का अधिकार है। सीनियर हाउस ऑफिसर (SHO) की जिम्मेदारी है कि वह लीगल सर्विस अथॉरिटी को इन्फॉर्म करें। किसी भी स्तर का मामला हो लीगल एड अथॉरिटी ही पीड़िता के लिए वकील का इंतजाम करती है।

4.Right to Delayed Registration
सेक्शुअल हैरेसमेंट या रेप की शिकार महिला अगर किसी कारण से तुरंत एक्शन नहीं लेती है, तो ऐसी स्थिति में बाद में भी रिपोर्ट दर्ज करवा सकती है। पुलिसकर्मी देर से रिपोर्ट दर्ज करने के लिए इनकार नहीं कर सकता है, लेकिन महिला को देरी का कारण उन्हें बताना होगा।

5.Right to ZERO FIR
महिलाएं अपनी शिकायत सुविधानुसार, किसी भी पुलिस स्टेशन में दर्ज करवा सकती है। इसे ZERO FIR कहते हैं। कोई पुलिसकर्मी ये कहते हुए एफआईआर दर्ज करने से मना नहीं कर सकता कि मामला उनके क्षेत्र का नहीं है। सीनियर हाउस ऑफिसर (SHO) को FIR लिखनी होगी। एफआईआर दर्ज होने के बाद संबंधित एरिया के पुलिस स्टेशन में ट्रांसफर कर दी जाती है।

6.Right to not being called to the Police Station
CPC (क्रिमिनल प्रोसीजर कोड) के सेक्शन 160 के अनुसार, किसी भी तरह की इन्क्वायरी के लिए महिला को पुलिस स्टेशन बुलाया नहीं जा सकता है। पुलिस काे खुद वहां पर जाना होगा जहां महिला रहती है। लेकिन साथ में एक महिला पुलिसकर्मी का होना आवश्यक है। इन्वेस्टिगेशन के दौरान महिला के साथ किसी करीबी या सगे-संबंधी की मौजूदगी जरूरी है।

7.Right to no Arrest
किसी भी महिला को सुबह होने से पहले और सूरज ढलने के बाद गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है। हालांकि, गंभीर मामला होने पर फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट के ऑर्डर पर ऐसा किया जा सकता है। अरेस्ट करते वक्त महिला पुलिसकर्मी का होना भी जरूरी है।

8.Right in Ancestral Property
द हिंदू सक्सेशन एक्ट में हुए संशोधन के बाद बेटियों और बेटों को पैतृक संपत्ति में बराबरी का हक दिया गया है। अगर कोई महिला चाहे तो अपने भाई और पिता से पैतृक संपत्ति में कभी भी अपना हिस्सा मांग सकती है।

9.Right Against Harrasment at Work
फीमेल इम्प्लॉई को वर्कप्लेस में सुरक्षित माहौल देना कंपनी (जहां 10 से ज्यादा इंप्लॉइज है) की जिम्मेदारी है। सेक्शुअल हैरेसमेंट ऑफ वुमन एट वर्कप्लेस एक्ट 2013 के तहत सेक्शुअल हैरेसमेंट के मामलों की सुनवाई के लिए पांच लोगों की कमेटी होनी चाहिए। इसमें चेयरपर्सन भी महिला ही होना जरूरी है।

10.Right to Equal Pay
इक्वल रेम्युनरेशन एक्ट, 1976 के तहत कोई भी संस्था या कंपनी पुरुषों की तुलना में महिलाओं को एक समान काम करने के लिए कम सैलेरी या भत्ता नहीं दे सकती है। जो सुविधाएं पुरुषकर्मियों को दिया जा रहा हैं, वही महिलाकर्मियों को भी पाने का अधिकार है।

11.Right to Maternity Leaves
मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट 1961 के तहत वर्किंग वुमन अगर 80 दिन काम करने के बाद गर्भधारण करती है तो उसे यह बेनिफिट मिलेगा। 12 हफ्तों की मैटरनिटी लीव (फुली पेड) डिलिवरी डेट से 6 हफ्ते पहले और बाद में ली जा सकती है। भले ही महिला गवर्नमेंट या प्राइवेट संस्था में रेग्युलर हो या कॉन्ट्रैक्ट बेसिस पर। आने वाले समय में ये लीव 26 हफ्तों की भी हो सकती है।

12.Right to No Sexual Harrasment
CPC (क्रिमिनल प्रोसीजर कोड) के सेक्शन 164 के तहत सेक्शुअल हैरेसमेंट की स्थिति में पीड़ित महिला के पुलिस केस को खारिज नही किया जा सकता है। इस तरह के मामलों में पीड़िता की मेडिकल जांच होना बेहद जरूरी होता है।

13.Dowery Prohibition Act 1961
अगर किसी महिला को उसका पति या ससुराल वाले दहेज के लिए मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित करते हैं तो वह उनके खिलाफ एक्शन ले सकती है। ऐसे में दोषी पाए जाने पर पांच साल की सजा, 15 हजार रुपए या दहेज में मिले सामान की रकम जितना जुर्माने के रूप में चुकानी पड़ सकती है।

14.Right against domestic violence
ताने मारना, अपमानित करना, भावनात्मक रूप से आहत पहुंचाने की कोशिश करना या हाथ उठाना घरेलू हिंसा कहलाती है। पति या ससुराल की ओर से ऐसा व्यवहार होने पर महिला उनके खिलाफ डोमेस्टिक वॉयलेंस एक्ट के तहत एक्शन ले सकती है। ऐसे में दोषी को एक साल की सजा या 20 हजार रुपए जुर्माना या दोनों हो सकता है।

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