तज़करा गौसे आज़म हुज़ूर मुहीउद्दीन अब्दुल क़ादिर जीलानी, पढ़ें ओर दूसरे भाइयो के लिए शेयर करें

आपकी तारीफ लिखना किसी कलम या बोलना किसी ज़बान के बस की बात नहीं है। आपका नाम- अब्दुल क़ादिर, लक़ब- मुहीउद्दीन, कुन्नियत- अबु मुहम्मद और उर्फियत- गौसे आज़म है। आपके वालिद सय्यद अबु स्वालह जंगी दोस्त, वाल्दा सय्यदा आमना उम्मुल खैर हसनी हुसैनी सय्यदज़ादे यानी हुज़ूर की नस्ल से हैं।

आपकी विलादत की खबर खुद हुज़ूर ने हज़रत इमाम हुसैन को इन अल्फाज़ में दी कि तेरी नस्ल से फलां सदी में एक बच्चा अब्दुल क़ादिर नाम का पैदा होगा जो गौसे आज़म बनेगा। आपकी पैदाइश के वक्त वाल्दा की उम्र साठ साल थी और विलादत से पहले जब एक बदबख्त ने उन्हें घर में अकेले देखकर बेइज़्ज़त करना चाहा तो गैबी तौर पर एक शेर ने उसे चीर फाड़ कर हिफाज़त का काम किया।

आपकी पैदाइश रमज़ान माह की चांद रात सन 470 हिजरी जीलान के मकाम पर हुई। पैदा होने के बाद से ही आपने रोज़े के वक्त में कभी मां का दूध तक नहीं पिया।अगले साल आपने रमज़ान का चांद होने की शहादत सुबह सादिक़ के बाद से दूध नहीं पीकर दी जो बाद में चांद होने का सबूत मिलने पर सच साबित हुई।
बचपन में ही जीलान से बगदाद जाने वाले काफले को लूटने वाले चालीस कज़्ज़ाकों को आपने अपनी छुपी चालीस अशर्फियां मां की हिदायत हमेशा सच बोलना के तहत दिखाकर ताइब करने का काम किया।

बगदाद में सोलह साल की उम्र में दीनी मदरसे में दाखिला लेकर सिर्फ सात साल की मुद्दत में तमाम दीनी उलूम से फरागत हासिल कर ली जिसमें कुरान के15 सिपारे तो मां के पेट से आपको हिफ्ज़शुदा थे। उसके बाद आप हज़रत अबुलखैर अबु सईद के मुरीद बन कर पच्चीस साल तो जंगल में इबादत करते हुए मस्ताना वार फिरे। फिर 40 साल रात दिन इस तरह रहे कि इशां के वज़ू
से फजर की नमाज़ अदा की।आपने 15 साल एक पैर पर खड़े हो होकर ऐसे नवाफिल अदा किये जिसकी हर रकअत में पूरा कुरान पढ़ते।

खिरका खिलाफत लेने के बाद जब आपने बाअज़ ओ नसीहत का काम शुरू करने का इरादा किया तो आपके मुंह में पहले हुज़ूर ने सात बार फिर हज़रत अली ने छः बार अपना लुआब डाला जिसके बाद आपका बाअज़ सुनने एक हुजूम होने लगा जिसमें खौफे इलाही से लोग चीखने लगते कई की मौतें तक हो जातीं लेकिन अनगिनत लोग इस्लाम भी क़ुबूल कर लिया करते थे।

आपने बगदाद में दीनी मदरसा कायम कर दर्स का काम बखूबी अंजाम देने के अलावा गरीब बच्चों की तालीम उनके खाने पीने माली इमदाद करने का इन्तज़ाम भी किया। आप अपने हिस्से की रोटियों को भी टुकड़े करके लोगों में यह कह कर बांट देते कि “खुद का खाना खाना नहीं बल्कि दूसरों का पेट भरना ही मोमिन की असली गिज़ा है”।

आपके बाअज़ की महफिल में होने वाली बारिश “मैं लोगों को ज़िक्र के लिए इकट्ठा कर रहा हूं तू मुन्तशिर कर रहा है” कहने पर थम गई। दरिया ए दजला की तुगयानी उनके अपना असा पानी के अंदर गाड़ कर “ऐ पानी बस यहां तक” कहने से खत्म हो गई।

एक मिर्गी की मरीज़ा के कान में उसके शौहर से “यहां शेख अब्दुल क़ादिर रहते है” कहलवा कर ठीक कर दिया। एक औरत की बेटे पैदा नहीं होने की शिकायत उसकी तमाम बेटियों को बेटों में बदल कर दूर कर दी। एक परेशान औरत का अकेला ढूब कर मरा बेटा बारह साल बाद मय बारात के घर ज़िंदा पहुंचा दिया।

ईसाई और मुसलमानों के बीच अपने अपने नबी की फौक़ियत का झगड़ा आपने एक पुरानी क़ब्र से कव्वाल ज़िंदा करके ईसाईयों से कल्मा पढ़वा कर खत्म किया। शरीर राफज़ियों के लाये कपड़ा ढ़ंके टोकरों में से पूछे जाने पर आपने लंगड़े लड़के को तो दौड़ा कर और अच्छे को बैठा कर उन्हें भी ताइब कर दिया।

एक चिड़िया जिसने दौराने वज़ू आप पर बीट कर दी थी और एक चूहा जो छत की मिट्टी कुरेद रहा था दोनों की गर्दनें पहले नज़रे हैबत से काटीं फिर रहम खाकर जोड़ दीं। एक औरत की अपने
पढ़ने के लिए छोड़े गये बेटे को सादा रोटी और आपको मुर्गी खाते देखने की शिकायत पर आपने खाई हुई उसी मुर्गी को ज़िंदा कर दिया।
एक बज़ुर्ग अबु सईद अब्दुल्लाह की सोलह साला अगवा बेटी को जिन्नात के सरदार से शरीर जिन्न को कत्ल करा कर वापस कराया। एक अज़मी काफले को लूटने वाले लुटेरों को मय सरदार अपनी खड़ाऊं से हलाक करा कर सारा माल वापस दिलाया।
जिस सामान पर आपका नाम लिख दिया जाये आज भी उसकी चोरी नहीं होती। एक बार आपने अपने हुजरे में चोरी करने घुसे एक चोर को ही अब्दाल बना कर हज़रत खिज़र के हवाले कर दिया।
एक बादशाह को जब उसकी दीनारों से भरी थैली से आवाम का खून निचोड़ दिखाया तो वो बेहोश हो गया। एक खलीफा के बेमौसम सेब मांगने पर आपने फिज़ा में हाथ बुलंद कर दो सेब पकड़ कर एक खुद काटा तो उसमें कस्तूरी की खुश्बू और जो खलीफा ने काटा उसमें कीड़े होना दिखा कर कहा कि ज़ालिम का हाथ लगने से फलों में भी कीड़े पड़ जाते हैं।
आपने अपने एक नमाज़ी मुरीद परिवार के दरवाज़े पर पर्दा लगवा कर बे नमाज़ियों की नज़रें नहूसत भरी साबित कर उस घर की बे बरकती खत्म की।आपने अपने कपड़े धोने वाले को क़ब्र में नकीरैन के सवालों से बचने “मैं गौसे आज़म का धोबी हूं” की हुज्जत सिखा कर उसे बे फिक्र कर दिया।
एक मुरीद की पेशानी देख उसकी किस्मत में लिखे सत्तर बार ज़िना करने को नींद में सत्तर बार अहतलाम की सूरत तब्दील करा दिया।आपने अपनी सख्त अलालत के वक्त अपनी पुश्त में एक और बेटे याहया का नुत्फा बाकी होना बता कर अभी मौत नहीं होना बतौर पेशिनगोई कहा जो बाद में सच साबित हुआ।
आप कहते मैं लोगों को उनके घरों, कपड़ों या जिस्म के अंदर शीशे की बोतल के अंदर जैसा आर पार देखता हूं मगर शरीयत की पाबंदी से नहीं बताता हूं। वक्त मुझे सलाम करके आगे बढ़ता है, बिना मेरी इजाज़त चांद सूरज का छुपना निकलना भी नहीं है। मैं जिन्नात का भी पीर हूं, मैं मशरिक से लेकर मगरिब तक कहीं भी पुकारने वाले की मदद करता हूं। जो भी मुझे अपना पीर मान लेता है वो मेरा मुरीद हो जाता है। बरोज़े हश्र बिना अपने मुरीदों को साथ लिये आप जन्नत में नहीं जायेंगे। आपसे एक ज़ईफ की शक्ल में सन् 511 हिजरी में दीन ने भी मुलाकात कर खुद को आपके ज़रिये नई ज़िंदगी हासिल होना बताया था।
इब्तदा में आप इतने जलाली थे कि कोई आपका नाम तक बेवज़ू नहीं लेता था। आपके फर्मान “मेरा ये कदम सब औलिया की गर्दन पर है” पर मोतरिज़ शेख सन्नान के लिए कहे गये “मेरा कदम खंजीर चराने वाले की गर्दन पर भी है” की पादाश में उन्हें एक लड़की के इश्क में खंजीर चराने पड़े और विलायत का दर्जा जाता रहा जो शेख सन्नान के एक मुरीद शेख महमूद के साथ रहने और दूसरे फरीदुद्दीन की गौसे आज़म के दरबार में खिदमत के तुफैल मिली माफी पर फिर से हासिल हुआ। बाद में हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की हिदायत पर आपने जलाल तर्क कर दिया और आप जमाली हो गये।आपकी वफात ग्यारह रबी उल आखिर 561 हिजरी को बगदाद शरीफ में हुई जहां आपका मज़ार आज भी हाजत रबाये खल्क़ है। बगदाद पहुंचने वाला कोई बज़ुर्ग अगर आपके मज़ार पर हाज़िर नहीं हो तो उसकी तमाम करामतें ज़ब्त हो जाती हैं।

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