जानने में लगा था कि सच में इस्लाम आतंकवाद को बढ़ावा देता है, जानते हुए खुद ही हो गया मुस्लिम

मेरा नाम अब्दल्लाह सामौर है। मैं एक महाविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय व्यवसाय की पढाई कर रहा हूँ। मैं अपने खाली समय में में डीजे का काम करता था और मैं एक क्लब में गाना बजाता था। मैं दुनिया में जो कुछ भी चल रहा है उन सब बातों को जानने का बहुत इच्छुक था और मुझे इन सब बातों को जानना बहुत अच्छा लगता था। धर्म के बारे में वैसे तो मैं उतना सोचता नही था।

फिर जब 11 सितम्बर का हमला हुआ, तब मीडिया और सरकार हर तरफ यही बोलते रहते की इस्लामिक आतंकवादियों ने ऐसा किया है। इस बात को सुनकर मेरे मन में कई सवाल उठने लगे और मैं मुसलमानो को जानना चाहता था की क्या सच्चाई है। क्या मुसलमान सच में ही ऐसे होते हैं। मीडिया में दिखाया जाता था की इस्लाम आतंकवाद को बढ़ावा देता है, मैं इसी बात को लेकर इस्लाम के कुछ सवाल जानना चाहता था। मैंने इस्लाम को जानना चाहता था की क्या ऐसा भी कोई धर्म है जो आतंकवाद को बढ़ावा देता है। पर जब मैंने इस्लाम को जानना शुरू किया तो मेरे सामने कई ऐसी बातें आईं जिनसे मैं अनजान था। और जब मुझको इनका पता चला तो मैं सच में इससे बहुत प्रभावित हुआ और इस्लाम की बातें मुझे बहुत अच्छी लगीं। मैं इस्लाम के बारे में और जानने का इच्छुक हो रहा था। मुझको आगे चल कर एक मुसलमान भाई मिले और उन्होंने मुझे एक पर्चा दिया जो की इस्लाम के बारे में थी। जब मैंने उसको पढ़ा तो उन बातों को मैं झुटला नही सकता था। मुझे ना चाहते हुए भी यकीन करना पड़ा। क्योंकि उसमें सब बातें सही ही थी।

एक बार रात में मैं उन्ही आदमी से व्हाट्सएप्प पर बात कर रहा था। हम मौत को लेकर चर्चा कर रहे थे। वह बातें ऐसी थी की मैं डर सा गया था। उन्होंने मुझको बहुत सी ऐसी बातें बताई जैसे की मरने के बाद हमको फिर उठाया जाएगा और हमसे बहुत से सवाल पूछे जाएंगे। फिर मैं उनसे बातें करता रहता था और एक दिन मैंने शहादह पढ़ लिया। और इस्लाम क़ुबूल कर लिया था।
उस समय भी मुझको इस्लाम के बारे में उतनी जानकारियां नही थी। मैं सिर्फ इतना ही जानता था की अल्लाह सिर्फ एक और अकेला है और मुहम्मद (सल अल्लाहु अलैहि वसल्लम) अल्लाह के नबी। और इसी वजह से मैंने शहादह पढ़ा था और एक यह भी वजह थी की मैंने इस्लाम में बहुत सी ऐसी बातें पाई जो की हम अपनी ज़िन्दगी में गलत करते हैं और हम सब उन बातों को जानते हुए भी नही समझते हैं।

पर आगे चल कर मेरा साथ बहुत बुरा हो गया। जिनसे मैं इस्लाम के बारे में जानता था, उनसे मेरा सम्पर्क टूट गया और फिर मैं उनसे बात नही कर पा रहा था। मैं सोचने लगा की अब क्या करूँगा। मुझे इस्लाम के बारे में उतनी जानकारियां नही थी। पर अल्लाह की मुझ पर महेरबानी थी जो मुझे और मुसलमान भाई मिल गए। उनसे मेरी दोस्ती हो गई और फिर मैं उनसे भी कुछ बातें सीखने लगा। मेरी उनसे दोस्ती कर ली थी और धीरे धीरे हम और अच्छे दोस्त बन गए। मैं सोचता था की मैं ही अकेला मुसलमान हूँ जिसने इस्लाम क़ुबूल किया है। पर बाद में मुझे पता चला की बहुत से ऐसे लोग हैं जो इस्लाम में आते रहते हैं। मैं बहुत खुश भी था की मेरे समूह में और भी लोग आ रहे थे जो अभी अभी ही मुसलमान हुए थे। मैं और भी ज़्यादा प्रोत्साहित महसूस करता था। मैं अपने आप को बहुत किस्मत वाला था जो मुझको इस्लाम में आने के लिए इतने मौके मिले। ज़ाहिर सी बात है की उनके साथ रहकर मैंने इस्लाम के बारे में बहुत सी बातें सीखीं।

एक बार मुझको याद है की मेरी माँ ने मुझसे कहा की चलो हम बर्गर खाते हैं। और वह सूअर के मांस की बर्गर होती थी। तो मैंने उनसे मना कर दिया और मेरे मुह से गलती से निकल आया की नही मैं नही खा सकता क्योंकि मैं मुसलमान हूँ। उन्होंने कहा नही तुम एक गैर मुस्लिम हो। मैंने कहा की मैं अल्लाह और उसके रसूल पर यकीन करता हूँ और उसी के रास्ते पर चलना चाहता हु। वह थोड़ा गुस्सा हुईं पर फिर धीरे धीरे वह मान गईं। लोग ऐसा सोचते हैं की इस्लाम में आने के बाद ज़िन्दगी थम जाती है। पर ऐसा कुछ नही है इस्लाम में आने के बाद आप और खुश से हो जाते हैं। और आप एक हल्का पन महसूस करते हैं। जो भी इस्लाम के बारे में गलत सोचते हैं या फिर इस्लाम में आना चाहते हैं मैं उनसे यही कहना चाहूंगा की आप अपने दिल की सुनिये और खुद से झूट मत बोलिये की इस्लाम गलत है और सच को मानिये।