कितनी ज़्यादा मुश्किलात के बाद इस्लाम हम तक पंहुचा और हम…..

कबूल ए इस्लाम से पहले मक्का में कोई शख्स मसअब बिन उमैर से ज़्यादा खूबसूरत हसीन ओ जमील न था। उनके जैसा लिबास मक्का की ज़मीन पर किसी नौजवान के तन पर कभी देखा नही गया। उनकी परवरिश का ये आलम था के उनके वालिदैन को उनसे शदीद मुहब्बत थी, जिस वजह से उन्होने अपने जिगर के टुकड़े को तमाम नाज़ो नेमतों से पाला था।

वो अपने ज़माने के हिसाब से बेहतरीन से बेहतरीन लिबास पहनते और उम्दा से उम्दा खुशबु इस्तेमाल करते वो जिस गली से गुज़रते वहां से उठने वाली खुशबु इस बात की गवाही देती के मसअब बिन उमैर यहां से गुज़र गया है जो कपड़ा एक बार पहन लेते दोबारा पहनने की नौबत नही आती उनके यहाँ उम्दा कपड़ों का ज़खीरा मौजूद था। लेकिन खुदा का फैसला देखिये एक सुबह उनके वालिदैन को खबर हुई की मसअब बिन उमैर मुसलमान हो गया है उसने मुहम्मद सल्ल के लाये दीन पर लब्बैक कह दिया है बस फिर क्या था अहले खाना में ज़लज़ला तारी हो गया। वालिदैन का दिल गुस्से से भर गया और वो शदीद सदमे में पड़ गए उनकी वालिदा और अहले खानदान की मुहब्बत नफ़रत के शोलों में बदल गई।

सारी नेमतें खत्म कर दीं गईं तमाम शानो शौकत और मुहब्बत को छीनकर तौहीद के मुजरिम को मुसीबतों के हवाले कर दिया गया खानदान वालों के ज़ुल्म और सितम से तंग आकर मसअब ने अल्लाह के नबी सल्ल के हुक्म पर पहले हबशा फिर मदीना हिजरत की। और फिर मदीने की फ़िज़ा ने वो मन्ज़र भी देखा की कीमती और उम्दा पोशाकें पहनने वाला एक छोटी सी सफेद चादर में तन ढांपे फिर रहा है।

गज़वा ए उहद के मौके पर जब दादे शुजाअत देने की बारी आई तो जेहाद का अलम (झंडा) आपके ही हाथ में था और इस अलम को इस अंदाज़ में बुलन्द किया हुआ था की जब मुशरिकीन के एक घुड़सवार इब्ने कमिया ने तलवार के वार से आपका दांया हाथ शहीद कर दिया तो आपने अलम को फौरन ही बांये हाथ में थाम लिया और जब बांया हाथ भी शहीद कर दिया तो आपने दोनों बाज़ुओं के बीच अलम को थाम लिया लेकिन अलम को जमीन पर हरगिज़ गिरने न दिया जब आपको नेज़े के वार से शहीद कर दिया तो अलम को आपके भाई ने सम्भाल लिया। वही मसअब बिन उमैर रज़ि आज अल्लाह के हुज़ूर इस हाल में हाज़िर हो रहे थे की उनके कफ़न के लिए सिर्फ एक चादर मयस्सर थी, जब सर को ढाँपा जाता तो पैर खुले रह जाते और जब पैरों को ढाँपा जाता तो सर खुला रह जाता बिल आखिर सर को ढांप दिया गया और पैरों को घास और पत्तों से ढक दिया गया।

आप सल्ल.उनकी लाश के करीब आये और ये आयत तिलावत फ़रमाई :

مِنَ الْمُؤْمِنِیْنَ رِجَالٌ صَدَقُوْا مَا عَاھَدُوا اللّٰہَ عَلَیْہِ

“अहले ईमान में से चन्द आदमी ऐसे हैं जिन्होंने अपने अल्लाह से जो अहद किया था उसे सच्चा कर दिखाया”

फिर आपने लाश से मुखातिब होकर फ़रमाया :

“ए मसअब बिन उमैर!! मैंने तुमको मक्का में देखा था जहाँ तुम्हारे जैसा हसीन और खुशपोशाक कोई न था लेकिन आज देखता हूँ के तुम्हारे बाल उलझे हुए हैं और जिस्म पर सिर्फ एक चादर है बेशक अल्लाह का रसूल गवाही देता है तुम लोग कयामत के दिन बारगाहे खुदावन्दी में कामयाब रहोगे”

आज दुनिया के जिस जिस गोशे में मुसलमान दीन ए इस्लाम पर कायम रहने की वजह से ज़ुल्म और तशद्दुद का निशाना बनाये जा रहे हैं, चाहे अहले खाना की लाइन से या ज़ालिम हुकूमतो की लाइन से. उनके लिए मसअब बिन उमैर रज़ि की ज़िन्दगी दिलों को ठंडक पहुंचाने वाली और खुशखबरी सुनाने वाली है।

और पुर सुकून ज़िन्दगी बसर करने वाले मुसलमानों के लिये लम्हा ए फ़िक्रिया है के ये दीन हम तक कैसी कैसी कुर्बानियो की बदौलत पंहुचा है जिसको हमने आज मज़ाक बना रखा है।

Writer: मुग़ीज़ अहमद यादव

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